भोपाल. किडनी खराब होने के कारण नौ दिन पहले खाना छोड़ चुकी सात वर्षीय बाघिन श्वेता की मौत हो गई है। श्वेता की बीमारी का पता लगाने में डॉक्टरों को सात दिन लग गए। किडनी खराब होने का पता चलते ही डॉक्टरों ने विशेषज्ञों द्वारा बताया इलाज भी शुरू किया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
वन विहार नेशनल पार्क में इस माह में यह दूसरी बाघिन की मौत है। इससे पहले नौ जून को बांधवी की फेंफड़ों में संक्रमण से मौत हो चुकी है। श्वेता की तबीयत खराब होने की सूचना पार्क प्रबंधन को सबसे पहले 13 जून को मिली। श्वेता की हाउसिंग में तैनात कर्मचारी ने बताया कि श्वेता खाना नहीं खा रही है। इसके बाद श्वेता का इलाज शुरू हो गया, लेकिन बीमारी का पता न होने के कारण श्वेता को सिर्फ आईबी फ्लूड और ताकत के इंजेक्शन दिए जाते रहे। सोमवार रात साढ़े दस बजे तक श्वेता ठीक थी। पार्क के सहायक संचालक एके खरे पौने 11 बजे घर गए और रात पौने एक बजे श्वेता की विदाई की खबर आ गई.
Tuesday, 22 June 2010
Monday, 21 June 2010
जुलाई में आएंगे सरिस्का में बाघ
जयपुर. रणथंभौर अभयारण्य से सरिस्का में बाघ शिफ्टिंग को वाइल्ड लाइफ इंस्टीटच्यूट ऑफ इंडिया ने मंजूरी दे दी है। इसके बाद इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। जुलाई के पहले सप्ताह में दो बाघों को रणथंभौर अभयारण्य से हेलिकॉप्टर के जरिए सरिस्का शिफ्ट किया जाएगा। डब्ल्यूआईआई से मंजूरी के बिना पहले यह काम अटका हुआ था।
डब्ल्यूआईआई के प्रतिनिधि अभी राज्य के दौरे पर हैं और बाघ शिफ्टिंग के तकनीकी पहलुओं का जायजा ले रहे हैं। केंद्र के प्रतिनिधि ने भी वन विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक की है। शिफ्टिंग की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद सेना भी हेलिकॉप्टर देने को तैयार हो जाएगी। केंद्र से मंजूरी नहीं मिलने से यह काम कई महीनों से अटका हुआ था। वन राज्य मंत्री रामलाल जाट ने बताया कि बाघ शिफ्टिंग पर केंद्र को रिपोर्ट सौंपने के बाद शिफ्टिंग की मंजूरी मिल गई है।
बाघों का कुनबा बढ़ाने की कवायद : सरिस्का में पहले भी दो बाघ शिफ्ट किए जा चुके हैं जिनमें से एक नर व एक मादा हैं। सरिस्का अभयारण्य में 2004 में बाघ पूरी तरह समाप्त हो गए थे। इसके बाद वहां पर बाहर से बाघों को लाकर उनकी संख्या बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पहले भेजे गए जोड़े से बाघों का कुनबा बढ़ाने में सफलता नहीं मिलने के बाद अब फिर एक बाघों के जोड़े को सरिस्का भेजने की तैयारी की जा रही है। रणथंभौर में बाघों की तादाद अपेक्षित सीमा से अधिक होने के कारण इनको सरिस्का शिफ्ट किया जाएगा
डब्ल्यूआईआई के प्रतिनिधि अभी राज्य के दौरे पर हैं और बाघ शिफ्टिंग के तकनीकी पहलुओं का जायजा ले रहे हैं। केंद्र के प्रतिनिधि ने भी वन विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक की है। शिफ्टिंग की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद सेना भी हेलिकॉप्टर देने को तैयार हो जाएगी। केंद्र से मंजूरी नहीं मिलने से यह काम कई महीनों से अटका हुआ था। वन राज्य मंत्री रामलाल जाट ने बताया कि बाघ शिफ्टिंग पर केंद्र को रिपोर्ट सौंपने के बाद शिफ्टिंग की मंजूरी मिल गई है।
बाघों का कुनबा बढ़ाने की कवायद : सरिस्का में पहले भी दो बाघ शिफ्ट किए जा चुके हैं जिनमें से एक नर व एक मादा हैं। सरिस्का अभयारण्य में 2004 में बाघ पूरी तरह समाप्त हो गए थे। इसके बाद वहां पर बाहर से बाघों को लाकर उनकी संख्या बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पहले भेजे गए जोड़े से बाघों का कुनबा बढ़ाने में सफलता नहीं मिलने के बाद अब फिर एक बाघों के जोड़े को सरिस्का भेजने की तैयारी की जा रही है। रणथंभौर में बाघों की तादाद अपेक्षित सीमा से अधिक होने के कारण इनको सरिस्का शिफ्ट किया जाएगा
Tuesday, 15 June 2010
‘मेरे पति को बंधक बनाए हैं वन अधिकारी!’
जबलपुर. बांधवगढ़ में बाघिन की हुई मौत के बाद से वन विभाग के ड्रायवर मानसिंह को अवैध रूप से बंधक बनाए जाने को लेकर उसकी पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। वैकेशन बैंच के जस्टिस केके लाहोटी और जस्टिस आरसी मिश्रा की युगलपीठ ने मामले को संजीदगी से लेते हुए याचिकाकर्ता के पति को गुरुवार को कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए हैं।
उमरिया जिले के इंदवार थानांतर्गत ग्राम कसेरू में रहने वाली नीतू बाई की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि उसके पति मान सिंह उमरिया के वन विभाग में ड्रायवर के पद पर कार्यरत हैं। आवेदक का कहना है कि 18 मई को उमरिया जिला पंचायत के सीईओ, रेंज ऑफीसर व अन्य की टीम बांधवगढ़ नेशनल पार्क में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत हुए कामों का निरीक्षण करने के लिए गई।
दो वाहनों में से एक वाहन याचिकाकर्ता का पति मानसिंह चला रहा था। निरीक्षण के बाद दोनों ही वाहन पार्क से बाहर आ गए। याचिका के अनुसार 19 मई की सुबह जब मानसिंह रेंज ऑफीसर का वाहन चला रहा था, तभी वायरलैस पर उन्हें (रेंज ऑफीसर को ) सूचना दी गई कि एडीशनल डायरेक्टर ने उन्हें तलब किया है। उसके बाद सारे अधिकारियों के साथ मानसिंह भी जंगल में गया और वहां पर बाघिन का शव बरामद किया गया।
बाघिन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उसकी मौत किसी वाहन की टक्कर से हुई है। मीडिया में इस मामले के जमकर उछलने पर तत्काल जांच शुरु हुई और प्रशासनिक अधिकारियों ने मानसिंह व अन्य के बयान दर्ज किए।
याचिका में आरोप है कि 24 मई को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर सीके पाटिल ने मानसिंह को बुलाया और तभी से वो और अन्य अधिकारी उसे बंधक बनाकर रखे हुए हैं। बिना किसी कारण के पति को बंधक बनाए जाने पर आवेदक ने उच्च अधिकारियों से कई शिकायतें कीं, लेकिन फिर भी उसे रिहा न किए जाने पर यह मामला हाईकोर्ट में दायर किया गया।
मामले पर आज हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शशांक शेखर और राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता दीपक अवस्थी हाजिर हुए। मामले पर जवाब पेश करने के लिए श्री अवस्थी ने कुछ समय प्रदान करने की प्रार्थना की, जो युगलपीठ ने स्वीकार की। इसके साथ ही युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के पति मानसिंह को 17 जून को कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए।
उमरिया जिले के इंदवार थानांतर्गत ग्राम कसेरू में रहने वाली नीतू बाई की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि उसके पति मान सिंह उमरिया के वन विभाग में ड्रायवर के पद पर कार्यरत हैं। आवेदक का कहना है कि 18 मई को उमरिया जिला पंचायत के सीईओ, रेंज ऑफीसर व अन्य की टीम बांधवगढ़ नेशनल पार्क में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत हुए कामों का निरीक्षण करने के लिए गई।
दो वाहनों में से एक वाहन याचिकाकर्ता का पति मानसिंह चला रहा था। निरीक्षण के बाद दोनों ही वाहन पार्क से बाहर आ गए। याचिका के अनुसार 19 मई की सुबह जब मानसिंह रेंज ऑफीसर का वाहन चला रहा था, तभी वायरलैस पर उन्हें (रेंज ऑफीसर को ) सूचना दी गई कि एडीशनल डायरेक्टर ने उन्हें तलब किया है। उसके बाद सारे अधिकारियों के साथ मानसिंह भी जंगल में गया और वहां पर बाघिन का शव बरामद किया गया।
बाघिन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उसकी मौत किसी वाहन की टक्कर से हुई है। मीडिया में इस मामले के जमकर उछलने पर तत्काल जांच शुरु हुई और प्रशासनिक अधिकारियों ने मानसिंह व अन्य के बयान दर्ज किए।
याचिका में आरोप है कि 24 मई को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर सीके पाटिल ने मानसिंह को बुलाया और तभी से वो और अन्य अधिकारी उसे बंधक बनाकर रखे हुए हैं। बिना किसी कारण के पति को बंधक बनाए जाने पर आवेदक ने उच्च अधिकारियों से कई शिकायतें कीं, लेकिन फिर भी उसे रिहा न किए जाने पर यह मामला हाईकोर्ट में दायर किया गया।
मामले पर आज हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शशांक शेखर और राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता दीपक अवस्थी हाजिर हुए। मामले पर जवाब पेश करने के लिए श्री अवस्थी ने कुछ समय प्रदान करने की प्रार्थना की, जो युगलपीठ ने स्वीकार की। इसके साथ ही युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के पति मानसिंह को 17 जून को कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए।
Monday, 7 June 2010
जहां टूरिस्ट वहां टाइगर
जबलपुर. भले ही यह बात कुछ अटपटी लगे लेकिन यह है सौ फीसदी सच कि जहां टूरिस्ट हैं वहीं टाइगर हैं और कान्हा नेशनल पार्क का वह क्षेत्र जिसे पर्यटकों के लिए खोला गया है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। करीब 950 वर्ग कि लोमीटर में फैले कान्हा नेशनल पार्क का मात्र 275 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही पर्यटकों के लिए खोला गया है और इसी में 80 प्रतिशत बाघों का बसेरा है। कान्हा से लगे फेन नेशनल पार्क हो या फिर नौरादेही, रानी दुर्गावती, संजय गांधी नेशनल पार्क हों, कहीं भी टाइगर नहीं हैं क्योंकि यहां पर्यटक भी नहीं आते।
कान्हा नेशनल पार्क को रोटेशन में एक साल तक बंद रखने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास पहुंचे अभी ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ है और न ही इस पर अभी कोई कार्रवाई प्रारंभ हुई है, लेकिन लॉज ऑनर एसोसिएशन ऑफ कान्हा ने इस प्रस्ताव को गलत बताने हुए आपत्ति की है। साथ ही यह सुझाव दिया है कि पाबंदी की बजाए टूरिस्ट जोन को बढ़ाया जाए तो बाघों की संख्या मंे बढ़ोत्तरी हो सकती है। एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि टाइगर को जो सुरक्षा पर्यटकों से मिलती है वह किसी से नहीं मिल सकती।
पर्यटक ही खोलते हैं भेद
किसी भी नेशनल पार्क में टाइगर या अन्य किसी वन्य पशु के साथ हुए किसी भी हादसे का खुलासा आमतौर पर पर्यटक ही करते हैं। अक्सर पयटकों के जूम वाले कैमरे और बाइनाक्युलर घायल टाइगर या अन्य किसी वन्य पशु को देख लेते हैं। फिर इसकी जानकारी पार्क प्रबंधन को दी जाती है, जिसके बाद कोई कार्रवाई होती है। हाल ही में बांधवगढ़ में हुई घटना का भेद भी पर्यटकों द्वारा ही खोला गया था। मुख्य द्वार पर हुई फायरिंग की जानकारी भी पर्यटकों ने ही दी थी।
सम्मान करते हैं वाइल्ड लाइफ का
एक जमाना था जब कान्हा नेशनल पार्क का प्रबंधन कान्हा में रिसोर्ट और होटल खोलने के लिए आमंत्रण दिया करता था। आज स्थिति बदल गई है, कोई रोक-टोक न होने से यहां होटलों, रिसॉर्ट्स और लॉजों की बाढ़ आ गई है, लेकिन जिन लोगों ने बरसों पहले यहां व्यवसाय प्रारंभ किया था, वो दरअसल में वाइल्ड लाइफ लवर हैं और जंगल तथा वहां के बाशिन्दों का पूर्ण सम्मान करते हैं। कान्हा के अधिकांश रिसॉर्ट और होटलों में वाइल्ड लाइफ के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई जाती है और नए आए पर्यटकों को नियम कायदों से भी अवगत कराया जाता है। दरअसल, वन विभाग के अफसर तो स्थानांतरित होते रहते हैं, लेकिन होटल-रिसॉर्ट के संचालक, गाइड, जिप्सियों के ड्राइवर और इस व्यवसाय में लगे अन्य लोग एक तरह से पार्क के एम्बेसेडर के रूप में कार्य करते रहते हैं।
कोई सोच नहीं सकता कि कान्हा को एक साल के लिए बंद करने के प्रस्ताव मात्र से हमारे दिलों में क्या बीत रही है? हमने अपनी सारी जिन्दगी वाइल्ड लाइफ के साथ बिता दी है। आंकड़े बताते हैं कि टाइगर वहीं मिलता है जहां पर्यटक रहते हैं। अगर पार्क बंद कर दिया गया तो ये टाइगर भी खत्म हो जाएंगे। सरकार को चाहिए कि सीमित वाहनों को प्रवेश दे, नए होटल नए गेट पर खोले जाएं और ऐसे नियम बनाए जाएं, जिससे पार्क और इस व्यवसाय में लगे लोगों का भला हो न कि पार्क बंद कर सबके लिए मुसीबत खड़ी की जाए। - सनी चड्ढा, रिसॉर्ट ओनर और एसोसिएशन के सदस्य
कान्हा नेशनल पार्क को रोटेशन में एक साल तक बंद रखने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास पहुंचे अभी ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ है और न ही इस पर अभी कोई कार्रवाई प्रारंभ हुई है, लेकिन लॉज ऑनर एसोसिएशन ऑफ कान्हा ने इस प्रस्ताव को गलत बताने हुए आपत्ति की है। साथ ही यह सुझाव दिया है कि पाबंदी की बजाए टूरिस्ट जोन को बढ़ाया जाए तो बाघों की संख्या मंे बढ़ोत्तरी हो सकती है। एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि टाइगर को जो सुरक्षा पर्यटकों से मिलती है वह किसी से नहीं मिल सकती।
पर्यटक ही खोलते हैं भेद
किसी भी नेशनल पार्क में टाइगर या अन्य किसी वन्य पशु के साथ हुए किसी भी हादसे का खुलासा आमतौर पर पर्यटक ही करते हैं। अक्सर पयटकों के जूम वाले कैमरे और बाइनाक्युलर घायल टाइगर या अन्य किसी वन्य पशु को देख लेते हैं। फिर इसकी जानकारी पार्क प्रबंधन को दी जाती है, जिसके बाद कोई कार्रवाई होती है। हाल ही में बांधवगढ़ में हुई घटना का भेद भी पर्यटकों द्वारा ही खोला गया था। मुख्य द्वार पर हुई फायरिंग की जानकारी भी पर्यटकों ने ही दी थी।
सम्मान करते हैं वाइल्ड लाइफ का
एक जमाना था जब कान्हा नेशनल पार्क का प्रबंधन कान्हा में रिसोर्ट और होटल खोलने के लिए आमंत्रण दिया करता था। आज स्थिति बदल गई है, कोई रोक-टोक न होने से यहां होटलों, रिसॉर्ट्स और लॉजों की बाढ़ आ गई है, लेकिन जिन लोगों ने बरसों पहले यहां व्यवसाय प्रारंभ किया था, वो दरअसल में वाइल्ड लाइफ लवर हैं और जंगल तथा वहां के बाशिन्दों का पूर्ण सम्मान करते हैं। कान्हा के अधिकांश रिसॉर्ट और होटलों में वाइल्ड लाइफ के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई जाती है और नए आए पर्यटकों को नियम कायदों से भी अवगत कराया जाता है। दरअसल, वन विभाग के अफसर तो स्थानांतरित होते रहते हैं, लेकिन होटल-रिसॉर्ट के संचालक, गाइड, जिप्सियों के ड्राइवर और इस व्यवसाय में लगे अन्य लोग एक तरह से पार्क के एम्बेसेडर के रूप में कार्य करते रहते हैं।
कोई सोच नहीं सकता कि कान्हा को एक साल के लिए बंद करने के प्रस्ताव मात्र से हमारे दिलों में क्या बीत रही है? हमने अपनी सारी जिन्दगी वाइल्ड लाइफ के साथ बिता दी है। आंकड़े बताते हैं कि टाइगर वहीं मिलता है जहां पर्यटक रहते हैं। अगर पार्क बंद कर दिया गया तो ये टाइगर भी खत्म हो जाएंगे। सरकार को चाहिए कि सीमित वाहनों को प्रवेश दे, नए होटल नए गेट पर खोले जाएं और ऐसे नियम बनाए जाएं, जिससे पार्क और इस व्यवसाय में लगे लोगों का भला हो न कि पार्क बंद कर सबके लिए मुसीबत खड़ी की जाए। - सनी चड्ढा, रिसॉर्ट ओनर और एसोसिएशन के सदस्य
कान्हा में मिला शावक का शव
मंडला. विश्व प्रसिद्ध कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में रविवार को बाघ के एक शावक का शव बरामद हुआ है। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के सूत्रों ने बताया कि उद्यान के किसली रेंज में सुबह करीब डेढ़ माह का शावक मृत अवस्था में मिला सूचना मिलते ही उद्यान के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंच गए। सूत्रों ने बताया कि शावक का पोस्टमार्टम किया जा रहा है। उसके बाद ही उसकी मौत की सही वजह पता चल पाएगी। आशंका जताई जा रही है किसी नर बाघ के हमले से इसकी मौत हुई है।
Sunday, 6 June 2010
पन्ना की दूसरी रानी भी मां बनी!
जबलपुर. हाल ही में बाघ शावकों से गुलजार हुए पन्ना टाइगर रिजर्व सें एक और खुशखबरी जुड़ रही है। पन्ना रेंज के बडौर बीट में पिछले करीब एक सप्ताह से जो संकेत मिले हैं, उनसे साफ जाहिर है कि पन्ना की दूसरी रानी भी मां बन चुकी है।
अंदर ताल के समीप बनी गुफा में बसेरा बनाई बाघिन ने लंबे समय से एक झलक तक नहीं दिखाई है। प्रबंधन ने सुरक्षा मुस्तैद कर वन कर्मियों को इस बात के लिये कैमरे थमा दिये हैं कि जैसे ही इस सौगात का दीदार हो उसे अविस्मरणीय क्षणों में कैद कर लिया जाए।
बडौर बीट में हर वक्त चहलकदमी करने वाली पन्ना की दूसरी रानी पिछले सात दिनों से उस गुफा से एक पल के लिये भी बाहर नहीं आई है, जहां करीब एक माह से उसका बसेरा बना है।
इससे दूसरी बाघिन के भी मां बनने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। पार्क प्रबंधन ने अतिरिक्त सुरक्षा कर्मी क्षेत्र में तैनात किये हैं। गुफा के इर्द-गिर्द बने दो मचानों की संख्या में इजाफा करते हुए दस कर दिया गया है।
इसके अलावा क्षेत्रीय अधिकारियों को विशेष निगरानी रखने का फरमान सौंपा गया है। सूत्रों का कहना है कि दबे पांव फील्ड डायरेक्टर भी दिन में करीब दो मर्तबा क्षेत्र का मुआयना करने पहुंच रहे हैं। दूसरी तरफ पार्क प्रबंधन ने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार किया है।
रात में भी निगरानी
लंबे समय तक बाघों की दहाड़ से बेरुख रहे पन्ना नेशनल पार्क में एक बार फिर अच्छे आसार बनता देख विशेष सावधानी बरती जा रही है। दिन के समय चौकसी तो ठीक रात के वक्त भी मचान में तैनात वन कर्मी बाघिन की आहट पाने कान चौंकन्ने किये हुए हैं। सूत्रों के अनुसार रात के वक्त में भी यदि बाघिन बाहर आती है तो उसके डील-डौल को भांपकर उसके मातृत्व की पुष्टि की जाएगी।
5 कैमरे 10 मचान
बडौर बीट के भीतरी इलाके में बने तालाब के समीप दस मचान तैयार किये गये हैं। गुफा से नजदीकी मचानों से वीडियो कैमरों से नजर रखी जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि क्षेत्र में पानी की पर्याप्त मात्रा साल के दिनों में हर वक्त बनी रहती है। लिहाजा इस क्षेत्र में वाइल्ड लाइफ का मूवमेंट ज्यादा रहता है। हालांकि पर्यटन के लिये इस क्षेत्र को शुरु आती दौर से ही बंद रखा गया है।
अंदर ताल के समीप बनी गुफा में बसेरा बनाई बाघिन ने लंबे समय से एक झलक तक नहीं दिखाई है। प्रबंधन ने सुरक्षा मुस्तैद कर वन कर्मियों को इस बात के लिये कैमरे थमा दिये हैं कि जैसे ही इस सौगात का दीदार हो उसे अविस्मरणीय क्षणों में कैद कर लिया जाए।
बडौर बीट में हर वक्त चहलकदमी करने वाली पन्ना की दूसरी रानी पिछले सात दिनों से उस गुफा से एक पल के लिये भी बाहर नहीं आई है, जहां करीब एक माह से उसका बसेरा बना है।
इससे दूसरी बाघिन के भी मां बनने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। पार्क प्रबंधन ने अतिरिक्त सुरक्षा कर्मी क्षेत्र में तैनात किये हैं। गुफा के इर्द-गिर्द बने दो मचानों की संख्या में इजाफा करते हुए दस कर दिया गया है।
इसके अलावा क्षेत्रीय अधिकारियों को विशेष निगरानी रखने का फरमान सौंपा गया है। सूत्रों का कहना है कि दबे पांव फील्ड डायरेक्टर भी दिन में करीब दो मर्तबा क्षेत्र का मुआयना करने पहुंच रहे हैं। दूसरी तरफ पार्क प्रबंधन ने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार किया है।
रात में भी निगरानी
लंबे समय तक बाघों की दहाड़ से बेरुख रहे पन्ना नेशनल पार्क में एक बार फिर अच्छे आसार बनता देख विशेष सावधानी बरती जा रही है। दिन के समय चौकसी तो ठीक रात के वक्त भी मचान में तैनात वन कर्मी बाघिन की आहट पाने कान चौंकन्ने किये हुए हैं। सूत्रों के अनुसार रात के वक्त में भी यदि बाघिन बाहर आती है तो उसके डील-डौल को भांपकर उसके मातृत्व की पुष्टि की जाएगी।
5 कैमरे 10 मचान
बडौर बीट के भीतरी इलाके में बने तालाब के समीप दस मचान तैयार किये गये हैं। गुफा से नजदीकी मचानों से वीडियो कैमरों से नजर रखी जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि क्षेत्र में पानी की पर्याप्त मात्रा साल के दिनों में हर वक्त बनी रहती है। लिहाजा इस क्षेत्र में वाइल्ड लाइफ का मूवमेंट ज्यादा रहता है। हालांकि पर्यटन के लिये इस क्षेत्र को शुरु आती दौर से ही बंद रखा गया है।
Friday, 4 June 2010
पैंथर का हमला
उदयपुर . स्थानीय हवाला गांव के खेत में बंधी भेंडों पर पैंथर ने गुरुवार को मध्यरात्रि धावा बोल दिया। इस दौरान उसने दो भेड़ों को मार गिराया तथा दो को घायल कर दिया। रैबारियों (भेड़ चराने वाले)के हल्ला करने पर पैंथर भाग खड़ा हुआ, लेकिन साथ में एक भेड़ को भी ले गया। घटनाक्रम के अनुसार शंकर सिंह के खेत में बिजापुर से उदयपुर आए पुराराम रेबारी ने गुरुवार को फतहसागर के पेटे में भेड़ों को चराने के बाद बांध दिया था। देर रात लगभग साढ़े बारह बजे वहां पैंथर आया और भेड़ों पर धावा बोल दिया।
पैंथर के वहां आने पर भेड़ों के झुंड में भी अफरा तफरी मच गई तथा वे चिल्लाने लगी। ऐसे में शंकरसिंह और पुराराम रेबारी दोनों जग गए। पुराराम ने बताया कि जब वो खेत की तरफ भागा तो उसने वहां पैंथर को देखा। पैंथर ने भेड़ की गर्दन को मुंह में दबा रखा था। देखते ही शंकरसिंह और पुराराम ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया ऐसे में पैंथर मुंह में भेड़ को दबाकर भाग निकला। अधिक अंधेरा होने के कारण वे यही नहीं बता पा रहे हैं कि पैंथर किस और भागा था।
पैंथर के वहां आने पर भेड़ों के झुंड में भी अफरा तफरी मच गई तथा वे चिल्लाने लगी। ऐसे में शंकरसिंह और पुराराम रेबारी दोनों जग गए। पुराराम ने बताया कि जब वो खेत की तरफ भागा तो उसने वहां पैंथर को देखा। पैंथर ने भेड़ की गर्दन को मुंह में दबा रखा था। देखते ही शंकरसिंह और पुराराम ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया ऐसे में पैंथर मुंह में भेड़ को दबाकर भाग निकला। अधिक अंधेरा होने के कारण वे यही नहीं बता पा रहे हैं कि पैंथर किस और भागा था।
बाघ को 20 जिप्सियों ने घेरा
जबलपुर. कान्हा नेशनल पार्क के श्रवण ताल में सुकून से बैठे बाघ पर एक टूरिस्ट की नजर पड़ते ही कुछ पल में वहां का नजारा बदल गया। दखदनदांजी भांपकर बाघ ने तालाब छोडने का मन बनाया लेकिन बाघ के आगे बढते ही एक के बाद एक करके पहुंची 20 जिप्सियों ने उसे को घेर लिया।
करीब आधा घंटे बाद दो वाहनों के बीच से बाघ को रास्ता मिला। भले ये रोजाना के हालात हो लेकिन हालकि में बांधवगढ़ की घटना के बाद भी अन्य पार्को मंे सुधार नजर नही आया है। बाघ के दिखते ही वाहनों की फर्राटा कोई नई बात नही। कान्हा रेंज में आज फिर ऐसे हालात बने।
सुबह-सुबह प्यास बाघ बुझाने श्रवण ताल पहुंचा तो पर्यटकों का झुण्ड भी आ गया। लेकिन बाघ ने कुछ देर में ही इंसानी मौजूदगी भाप ली और वहां से निकले तालाब से बाहर आ गया। सुबह करीब 7:30 बजे के इस घटनाक्रम में अहम बात यह है कि कुछ देर में ही चारो तरफ से पहुंची करीब 20 जिप्सियों ने ऐसे कोई रास्ता नही छोड़ा जिससे बाघ भीतरी हिस्से में जा सके। वाहनों में सवार एक सैकडा से अधिक पर्यटकों ने अपने-अपने तरह से इस क्षण का रोमांच महसूस किया। प्राय: हर तरफ से घिरे बाघ को करीब 25 मिनिट बाद रास्ता मिला वो भी दो वाहनों के बीच से..।
करीब आधा घंटे बाद दो वाहनों के बीच से बाघ को रास्ता मिला। भले ये रोजाना के हालात हो लेकिन हालकि में बांधवगढ़ की घटना के बाद भी अन्य पार्को मंे सुधार नजर नही आया है। बाघ के दिखते ही वाहनों की फर्राटा कोई नई बात नही। कान्हा रेंज में आज फिर ऐसे हालात बने।
सुबह-सुबह प्यास बाघ बुझाने श्रवण ताल पहुंचा तो पर्यटकों का झुण्ड भी आ गया। लेकिन बाघ ने कुछ देर में ही इंसानी मौजूदगी भाप ली और वहां से निकले तालाब से बाहर आ गया। सुबह करीब 7:30 बजे के इस घटनाक्रम में अहम बात यह है कि कुछ देर में ही चारो तरफ से पहुंची करीब 20 जिप्सियों ने ऐसे कोई रास्ता नही छोड़ा जिससे बाघ भीतरी हिस्से में जा सके। वाहनों में सवार एक सैकडा से अधिक पर्यटकों ने अपने-अपने तरह से इस क्षण का रोमांच महसूस किया। प्राय: हर तरफ से घिरे बाघ को करीब 25 मिनिट बाद रास्ता मिला वो भी दो वाहनों के बीच से..।
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